लोग क्या कहेंगे ? आभास जैन भोपाल
(अधिवक्ता एवं विचारक)
(व्यंग)
मै आज तक ये नहीं जान पाया कि ये कौन लोग हैं, जो कुछ कहते हैं और ये जो लोग कुछ कहते हैं इन लोगों को सुनता कौन है । मुझे तो लगता है जो सुनने वाले लोग हैं न, कहने वाले लोग भी वही होंगे ।
बड़ा सवाल ये है कि क्या कहने वाले लोगों की वजह से सुनने वाले लोग, क्या कहना छोड़ देंगे ! जब कहना सुनना ही नहीं रहेगा तो प्रकृति ने मुख और कान दिये ही क्यों जब दे ही दिये हैं, तो कहना सुनना तो चलता ही रहेगा । जब सुन-सुन कर सुनने वाला पक जाता है तो उसकी आत्मा चित्कार उठती है, अंर्तद्वंद से पीढ़ित ऐसा जातक तब सबसे कहने लगता है कि मौन हो जाओ और सुनने वाले मौन के बिषय में कह-कहकर सारे संसार को सुनाने लगते हैं ।
वो कुछ कहना चाहता था मगर उसने कुछ नहीं कहा उससे पूछा कि क्यों नहीं कहा तो उसने कहा ‘‘कौन सुनेगा किसको सुनायें इसलिए चुप रहते हैं’’ । फिर किसी ने पूछा कि तुमने क्यों कहा, तो उसने कहा ‘‘कुछ तो लोग कहेंगे लोगो का काम है कहना’’।
भारतीय सदैव कुछ कहना चाहते थे परंतु संस्कारों की मर्यादा, पुर्वाग्रहों की जड़ता, समाज और शासन के भय से वे कुछ कह न सके यही एक कारण था जिसने आम भारतीय के जीवन में क्रांति नहीं घटने दी । मूल्य संर्वधन के दबाव ने आम भारतीयों को स्वतंत्र अभिव्यक्ति से वंचित रखा है ।
जो मनुष्य कुछ कहता नहीं वो सहता है, वो सहनशील तो हो सकता है लेकिन क्रांति का हिस्सा नहीं बन सकता वह परिवर्तन के लिए संघर्ष नहीं करता और जिस समाज में क्रांति न हो वह समाज चेतना विहीन शरीर के समान है, सहनशील समाज को आसानी से जीता जा सकता है यही एक कारण प्रमुख है कि भारत सदियों तक पराधीन रहा है ।
इसलिए कहना जरूरी है, विरोध बदलाव का महत्वपूर्ण तत्व है जो गलत को गलत न कहे उस समाज के विकास की संभावनायें शून्य हो जाती है । इस कहा सुनी की उधेड़बुन में उलझा मैं भी अब यही सोच रहा हूं कि पाठक इसे पढ़कर क्या कहेंगे ।
आभास जैन भोपाल
(अधिवक्ता एवं विचारक)
लोग क्या कहेंगे ? आभास जैन भोपाल (अधिवक्ता एवं विचारक) (व्यंग)
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