Monday, 18th December 2017

मज़बूत होने वाली है RSS पर भी मोदी की पकड़

Mon, Sep 18, 2017 7:36 PM

नईदिल्ली : नरेंद्र मोदी की पकड़ अब आरएसएस पर भी होने वाली है जल्द ही उनके चहेते दत्तात्रेय होसबोले  सरकार्यवाह  बनने वाले हैं |   भैयाजी का वर्तमान कार्यकाल फिर ख़त्म होने को है  और इस  बार फिर होसबोले को सरकार्यवाह बनाने की कोशिशें शुरू की जा चुकी हैं. और संघ के अंदरूनी सूत्रों की मानें तो इस बार की कोशिशें पहले से ज्यादा गंभीर और सधी हुई हैं. बहुत उम्मीद है कि अक्टूबर के महीने में मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में होने वाली संघ के केंद्रीय कार्यकारी मंडल की बैठक में इस बाबत कोई फैसला भी ले लिया जाए. और इसके बाद अगले साल मार्च में संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक के दौरान इस फैसले पर अंतिम मुहर लगा दी जाए.
यह मार्च 2015 की बात है. यानी मई-2014 में केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के 10 महीने बाद की. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) में एक गंभीर परिवर्तन की सुगबुगाहट हुई थी. सुगबुगाहट क्या उसे गंभीर कोशिश कहें तो भी ज़्यादा गलत नहीं होगा. आरएसएस के वरिष्ठ पदाधिकारी और नरेंद्र मोदी के समर्थक समझे जाने वाले दत्तात्रेय होसबोले को संघ का सरकार्यवाह बनाने का प्रयास था वह. लेकिन यह प्रयास आख़िरी मौके पर धराशायी हो गया और निवर्तमान सरकार्यवाह सुरेश राव जोशी (भैयाजी) को तीन साल का अगला कार्यकाल मिल गया.
संघ में सबसे बड़ा पद सरसंघचालक का होता है. यह पद वर्तमान में मोहन भागवत के पास है. लेकिन चूंकि सरसंघचालक को आरएसएस के संविधान के हिसाब से मार्गदर्शक-पथप्रदर्शक का दर्ज़ा मिला है इसलिए वे संघ की रोजमर्रा की गतिविधियों में ज़्यादा सक्रिय भूमिका नहीं निभाते. ऐसे में उनके मार्गदर्शन में संघ का पूरा कामकाज सरकार्यवाह (महामंत्री) और उनके साथ चार सह-सरकार्यवाह (संयुक्त महामंत्री) ही देखते हैं.
चूंकि सरकार्यवाह इस पांच सदस्यीय टीम के मुखिया होते हैं. इसलिए संघ में उनके रुतबे का अंदाज़ा सहज ही लगाया जा सकता है. फिर भी अगर और आसानी से समझना हो तो कॉरपोरेट संस्कृति के हिसाब से कहा जा सकता है कि सरकार्यवाह असल में मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) जैसे होते हैं. जिन पर किसी कंपनी या संगठन के कार्यसंचालन की असल ज़िम्मेदारी होती है. इस पद की ये अहमियत ही वह बड़ा कारण भी है जिसके चलते संघ ने अब तक अपने इतिहास में आरएसएस की मौलिक पृष्ठभूमि से आने वाले को ही हमेशा यह जिम्मा सौंपा है. मार्च-2015 में दत्तात्रेय होसबोले को सरकार्यवाह जैसी अहम ज़िम्मेदारी सौंपने का संघ के भीतर ही एक वर्ग ने विरोध किया था. इसकी वजह यह थी कि वे संघ प्रचारक बनने से पहले ही अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) में सक्रिय थे. यानी वे भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस की इस छात्र इकाई (एबीवीपी) में राजनीति करते थे. यही नहीं मूल रूप से कर्नाटक से ताल्लुक होसबोले एबीवीपी में ही आरएसएस की तरफ से दो दशक तक संगठन महामंत्री भी रह चुके हैं. इसके बाद पूरी तरह उन्होंने आरएसएस की गतिविधियों में अपने आप को लगा दिया.

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