Monday, 18th December 2017

दिलचस्प रहेंगे हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव

Wed, Jul 19, 2017 6:55 PM

शिमला :इस साल जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, उनमें सबसे अधिक चर्चा गुजरात के विधानसभा चुनावों की है. इसकी कई वजहें भी हैं. सबसे पहली बात तो यही है कि यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गृह राज्य है और यहां भारतीय जनता पार्टी किसी भी कीमत पर हारना तो दूर अपना प्रदर्शन तक खराब करना नहीं चाहेगी. अगर ऐसा होता है तो जितने सवाल गुजरात भाजपा के नेतृत्व पर नहीं उठेंगे, उससे अधिक नरेंद्र मोदी और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह पर उठेंगे. इस पृष्ठभूमि में अगर देखा जाए तो स्वाभाविक तौर पर केंद्र सरकार और सत्ताधारी पार्टी भाजपा का जोर इस राज्य पर रहेगा.
गुजरात के साथ ही हिमाचल प्रदेश में भी चुनाव होने हैं. इस राज्य को अपेक्षाकृत छोटा माना जाता है. यहां के विधानसभा चुनाव की कम चर्चा के पीछे यह भी एक वजह है. यहां अभी वीरभद्र सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार चल रही है. बीते कुछ समय के दौरान वे कई तरह के भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे रहे हैं. उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के कई मामले भी चल रहे हैं. उनकी उम्र भी काफी हो चली है. ऐसे में प्रदेश भाजपा पूरा जोर लगाए हुए है कि एक और राज्य से कांग्रेस सरकार का सफाया हो जाए. लेकिन 68 विधानसभा सीटों वाले इस राज्य की राजधानी शिमला से सरकार चलाने की उसकी राह इसके बाद भी काफी मुश्किल बनी हुई है.हिमाचल प्रदेश के कुछ लोगों से बात करने पर पता चलता है कि वीरभद्र सिंह की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार के संतोषजनक कामकाज के बावजूद यहां भी अन्य राज्यों की तरह कांग्रेस के खिलाफ एक माहौल दिख रहा है. हिमाचल सरकार से सेवानिवृत्त हुए एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं, ‘यहां कांग्रेस की स्थिति थोड़ी ठीक हो सकती थी, अगर कोई उम्मीद जगाने वाला नेतृत्व दिखता. लेकिन वीरभद्र सिंह की उम्र 83 साल हो गई है और उनके अलावा कोई और उम्मीद जगाने वाला नेता कांग्रेस में दिखता नहीं है.’ यही स्थिति भाजपा को इस पहाड़ी राज्य में मजबूत बना रही है.
 भाजपा की भी राज्य में अपनी समस्याएं हैं और इनकी वजह से आम लोगों में एक भ्रम की स्थिति भी है. दरअसल, कुछ समय पहले तक प्रदेश भाजपा की राजनीति प्रेम कुमार धूमल और शांता कुमार के खेमों में बंटी हुई थी. फिर शांता कुमार धीरे-धीरे कमजोर होते चले गए और धूमल कैंप काफी मजबूत हो गया. धूमल समर्थकों की भाजपा में धमक बढ़ाने में उनके बेटे अनुराग ठाकुर की भी भूमिका रही. धूमल द्वारा खाली की गई सीट हमीरपुर से लोकसभा चुनाव जीतने वाले अनुराग ठाकुर ने भाजपा की राष्ट्रीय राजनीति में भी अपनी एक पहचान बनाई. वे भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड की राजनीति में भी लंबे समय तक मजबूत स्थिति में रहे और अंततः बोर्ड के अध्यक्ष पद तक पहुंचे. इससे प्रदेश भाजपा में और आम लोगों में यह धारणा मजबूत हुई कि प्रदेश की राजनीति के केंद्र धूमल रहेंगे और उनके बाद यह जिम्मेदारी उनके पुत्र अनुराग ठाकुर के जिम्मे आ जाएगी.
लेकिन यहीं पर प्रदेश भाजपा की राजनीति में एक नया कोण केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा के रूप में जुड़ जाता है. जब पार्टी 2012 का विधानसभा चुनाव लड़ रही थी तो उस वक्त मुख्यमंत्री धूमल थे और पूरे चुनाव अभियान की बागडोर अनुराग ठाकुर ने संभाल रखी थी. पार्टी में राष्ट्रीय स्तर पर वह दौर लालकृष्ण आडवाणी का था. माना जाता है कि आडवाणी का आशीर्वाद धूमल के साथ रहा है. लेकिन जीत की संभावनाओं के बीच अंततः भाजपा वह चुनाव हार गई. उस वक्त भी नड्डा पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव थे हालांकि प्रदेश की राजनीति में उनकी भूमिका सीमित थी.
पर नरेंद्र मोदी और अमित शाह के राष्ट्रीय राजनीति में शीर्ष पर आते ही पार्टी के अंदर स्थितियां बदल गईं. 2012 में प्रदेश पर हाशिये पर दिख रहे नड्डा अब केंद्र में हैं और उस वक्त केंद्र में दिखने वाले धूमल और उनके बेटे अनुराग अब हाशिये पर दिख रहे हैं. अनुराग ठाकुर की स्थिति बीसीसीआई से उन्हें सुप्रीम कोर्ट द्वारा हटाए जाने के बाद काफी कमजोर हुई है. माना जाता है कि जिस तरह से आडवाणी का आशीर्वाद धूमल के साथ था, वैसे ही मोदी का आशीर्वाद नड्डा के साथ है. बिहार के प्रदेश अध्यक्ष रहे मंगल पांडेय को हिमाचल प्रदेश का प्रभारी बनाए जाने में भी नड्डा की भूमिका बताई जाती है.
कुल मिलाकर देखा जाए तो हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनावों की जो तस्वीर बन रही है उसमें कांग्रेस का कमजोर नेतृत्व इसे उतना दिलचस्प नहीं बना रहा जितना भाजपा के अंदर नेतृत्व को लेकर चल रहा आंतरिक संघर्ष.

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