Monday, 18th December 2017

उत्तर प्रदेश के पांच मुख्यमंत्री हैं !

Thu, Jun 29, 2017 7:46 PM

 लखनऊ : उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार के 100 दिन पूरे हो गए हैं. ऐतिहासिक जनादेश के साथ उनकी सरकार बनी थी. जब योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने तो यह कहा जा रहा था कि वे बेहद कड़क मुख्यमंत्री साबित होंगे. कहा जा रहा था कि पिछली सरकार के उलट उनके राज में कानून व्यवस्था की स्थिति ठीक रहने वाली है. कई लोग यह भी कह रहे थे कि अपनी सरकार में वे ज्यादातर ताकत अपने हाथ में रखने वाले हैं.
योगी सरकार के अब तक के कार्यकाल में उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि किसानों की कर्ज माफी है. ऐसे वादे अक्सर चुनाव में किए जाते हैं और उसे जीतने के बाद भुला दिए जाते हैं. लेकिन योगी सरकार ने अपने इस वादे को पूरा किया. उत्तर प्रदेश में किसानों की कर्ज माफी के बाद कुछ और राज्यों को भी इसका ऐलान करना पड़ा. इसके अलावा अब तक के कार्यकाल में योगी सरकार अधिकांश मौकों पर गलत वजहों से ही चर्चा में रही है. फिर चाहे रोमियो स्क्वैड का मामला हो या गोरक्षा को लेकर अपनाया जा रहा आक्रामक रुख. कुछ जगहों पर एक खास समुदाय के लोगों को निशाना बनाने को लेकर भी उनकी सरकार के कामकाज पर आरोप लगे. वहीं सहारनपुर में इस दौरान एक दलित आंदोलन भी उठ खड़ा हुआ.
कुल मिलाकर देखा जाए तो जिन योगी आदित्यनाथ से कड़क और चुस्त प्रशासन की उम्मीद की जा रही थी, उनके लाचार दिखने की शुरुआत हो गई है. उनकी लाचारी सिर्फ कानून व्यवस्था के मामले में ही नहीं दिख रही बल्कि उन्हें अपने मन के अफसर भी नहीं मिल पा रहे हैं. कहा जा रहा है कि योगी सरकार के कामकाज में दिल्ली का हस्तक्षेप काफी अधिक है. उत्तर प्रदेश सरकार में अहम पदों पर दिल्ली से भेजे गए कुछ अफसरों के बारे में कहा जा रहा है कि उन्हें दिल्ली ने उन पर थोपा है.
दरअसल, यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें यह कहा जा रहा है कि योगी आदित्यनाथ सरकार में सिर्फ एक नहीं बल्कि पांच मुख्यमंत्री हैं. कुछ इसी तरह के आरोप उत्तर प्रदेश की पिछली यानी अखिलेश यादव सरकार पर भी लगते थे. जब अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने की उस वक्त उनकी उम्र काफी कम थी और उन्हें कोई प्रशासनिक अनुभव भी नहीं था. इसलिए उनके शुरुआती कार्यकाल में यह आरोप लगे कि अपनी सरकार पर उनका पूरा नियंत्रण नहीं है.
उस वक्त अखिलेश यादव सरकार के कामकाज में उनके पिता मुलायम सिंह यादव, चाचा शिवपाल यादव और रामगोपाल यादव और पार्टी के वरिष्ठ नेता और मंत्री आजम खान का दखल रहता है. इस नाते यह कहा जाने लगा कि प्रदेश को एक मुख्यमंत्री - अखिलेश यादव - नहीं बल्कि पांच-पांच मुख्यमंत्री मिलकर चला रहे हैं. इसे घुमा-फिराकर कुछ लोग ऐसे भी कहते थे कि अखिलेश यादव की सरकार में जो फैसला पंचम तल (उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री का कार्यालय सचिवालय के पंचम तल पर है) पर लिया जाता है, वह नीचे आते-आते बदल जाता है. हालांकि, अपने कार्यकाल के बाद के दिनों में अखिलेश ने पूरी बागडोर अपने हाथों में लेने की कोशिश की लेकिन तब तक देर हो गई थी.
अब मोटे तौर पर यही स्थिति योगी आदित्यनाथ की सरकार में बनते दिख रही है. योगी आदित्यनाथ तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं ही लेकिन यह भी कहा जा रहा है कि उनके साथ चार और मुख्यमंत्री प्रदेश की सरकार को चला रहे हैं. इनमें दो उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और दिनेश शर्मा के अलावा उनकी सरकार के दो प्रमुख मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह और श्रीकांत शर्मा शामिल हैं.
केशव प्रसाद मौर्य और दिनेश शर्मा मुख्यमंत्री बनने की दौड़ में भी शामिल थे. केशव प्रसाद मौर्य पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं और चुनावों के दौरान संगठन की बागडोर उनके हाथ में थी. उत्तर प्रदेश में पार्टी को मिली भारी जीत में पिछड़ा वर्ग के मतदाताओं की अहम भूमिका बताई गई. इस नाते अंतिम समय तक यह लग रहा था कि पिछड़े वर्ग से संबंध रखने वाले केशव प्रसाद मौर्य को प्रदेश में सरकार चलाने की जिम्मेदारी मिल सकती है. पार्टी में और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भी कुछ लोग ऐसे हैं जो यह मान रहे थे कि मुख्यमंत्री की कुर्सी पर हक तो केशव प्रसाद मौर्य का ही बनता है. अंतिम बाजी भले ही केशव प्रसाद मौर्य के हाथ नहीं लगी हो लेकिन बतौर उपमुख्यमंत्री भी वे योगी सरकार के सबसे ताकतवर लोगों में खुद मुख्यमंत्री के बाद सबसे आगे हैं.
दूसरे उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के बेहद करीबी बताए जाते हैं. माना जाता है कि अमित शाह का दिनेश शर्मा पर काफी भरोसा है. कहा जाता है कि शर्मा अक्सर शाह को उत्तर प्रदेश सरकार के कामकाज के बारे में जानकारी देते रहते हैं. संघ और उसके सहयोगी संगठनों पर भी दिनेश शर्मा की मजबूत पकड़ बताई जाती है. इन वजहों से यह माना जा रहा है कि योगी सरकार में कई अहम फैसले वे कर रहे हैं और कई सामूहिक फैसलों पर भी उनका खासा प्रभाव रहता है.
इन दोनों के अलावा योगी सरकार के सबसे अधिक दिखने वाले दो चेहरे हैं सिद्धार्थनाथ सिंह और श्रीकांत शर्मा. यह तय किया गया है कि मीडिया के सामने सरकार का पक्ष रखने का काम सिर्फ यही दो लोग करेंगे. योगी सरकार बनने से पहले ये दोनों लोग राष्ट्रीय टीम में थे. सिद्धार्थ नाथ सिंह 2014 के लोकसभा चुनावों में टिकट पाने के प्रयास में थे लेकिन उन्हें टिकट नहीं मिला. इस बार वे विधानसभा चुनाव में उतरे और उन्हें कामयाबी हाथ लगी. श्रीकांत शर्मा भी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता के तौर पर काम कर रहे थे. इन दोनों लोगों के बारे में यह राय बन रही है कि ये दोनों दिल्ली स्थित पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के आंख-कान हैं. इसलिए कहा जा रहा है कि ये दोनों जो निर्णय लेते हैं, उन पर कोई टोका-टाकी नहीं की जाती है. इस नाते यह भी कहा जा रहा है कि ये दोनों भी मुख्यमंत्री की तरह ही काम कर रहे हैं.
आदित्यनाथ को पसंद करने वाले लोगों का कहना है कि उनके पास प्रशासनिक अनुभव नहीं रहा है, इसलिए उन्हें चीजों को समझने में थोड़ा वक्त लग रहा है. ऐसे लोगों की उम्मीद है कि आने वाले दिनों में वे इस स्थिति को बदल देंगे. लेकिन उन्हें यह याद रखना चाहिए कि प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की जो छवि शुरुआती दिनों में बनी, वह उनके साथ अंत तक चिपकी रही. इस लिहाज से योगी आदित्यनाथ के पास स्थितियों को सुधारने के लिए अब बहुत ज्यादा वक्त नहीं है.

Comments 0

Comment Now


Videos Gallery

Poll of the day

क्या बिहार की तर्ज पर यूपी चुनाव में भी महागठबंधन बन पाएगा?

81 %
0 %
19 %

Photo Gallery