Monday, 23rd October 2017

विवादों में 'पूर्व का ऑक्सफोर्ड' : इलाहाबाद विश्वविद्यालय

Tue, May 2, 2017 1:52 AM

- नेहा - 

इलाहाबाद विश्वविद्यालय कभी पूर्व का ऑक्सफोर्ड कहलाता था। अब भी इसे यही नाम दे दिया जाता है, लेकिन क्या शिक्षा और गरिमा के सवाल पर अब भी ये विश्वविद्यालय उतना ही खरा उतरता है, ये सवाल भी अब उठने लगा है।

आज इलाहाबाद विश्वविद्यालय हिंसक राजनीति, तोड़-फोड़, कुलपतियों की तानाशाही और हॉस्टलों में अवैध छात्र-छात्राओं के कब्जे के लिए जाना जाने लगा है। देश के चार सबसे पुराने विश्वविद्यालयों में गिने जाने वाले इलाहाबाद विश्वविद्यालय की मौजूदा हालत का जिम्मेदार कौन है? इस सवाल का कोई एक जवाब नहीं दिया जा सकता और कई सारे तत्व इसके लिए जिम्मेदार हैं।

वर्तमान में ये विश्वविद्यालय जिन चुनौतियों से जूझ रहा है, उनकी  संख्या बहुत ज्यादा है। इसके महाविद्यालयों में प्रत्येक कोर्स में सीटों की संख्या में करीबन 54 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो चुकी है, लेकिन प्रवेश प्रक्रिया में धांधली और नकल की खबरें लगातार आती रहती हैं। विश्वविद्यालय की शिक्षा की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।

पिछले कुछ सालों से इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छवि पर दाग लगाने वाले कुछ प्रमुख कारणों में विलंब से होने वाली दाखिला प्रक्रिया, एंट्रेंस एक्ज़ाम के पेपर लीक होना, परीक्षा कक्ष में नकल होना, छात्रों को देरी से हॉस्टल मिलना और हॉस्टलों में अवैध छात्रों के कब्जे, सालों से हॉस्टलों का वॉशआउट न होना, नए छात्र-छात्राओं को शिक्षा का उचित माहौल न मिलना, मात्र 8 हजार रुपए फैलोशिप पाने वाले रिसर्च स्कॉलरों के क्लास लेने का नियम, और शोध छात्र-छात्राओं से एचआरए प्लस फीस लेना शामिल हैं।


कुछ और बेहद चिंतनीय मुद्दे छात्र-राजनीति के नाम पर गुंडा तत्वों की सक्रियता भी है जिसकी झलक विश्वविद्यालय परिसर में और कक्षाओं के बाहर पेट्रोल बम तक फोड़े जाने की घटनाओं के रूप में मिलती है। छात्र भी विश्वविद्यालय हितों पर फोकस करने के बजाय, दलगत राजनीति में ज्यादा सक्रिय हो गए हैं, और इस कारण छात्र-छात्राओं के हित पीछे छूटने लगे हैं।

क्या इस बात पर कोई यकीन कर सकता है कि पूर्व के इस ऑक्सफोर्ड में दीक्षांत समारोह तक नहीं होता है। छात्राएँ बेहद असुरक्षा के माहौल में है लेकिन उनके लिए कोई आत्मरक्षा का कार्यक्रम तक नहीं चलाया जाता। छात्र-छात्राओं की बढ़ती संख्या के बीच छात्रावासों की संख्या बढ़ाए जाने का मुद्दा कभी नहीं उठता। न जाने कितने प्रतिभाशाली बच्चे छात्रावास न मिलने के कारण पढ़ाई छोड़कर वापस चले जाते हैं।

पूर्व के इस ऑक्सफोर्ड में 24 घंटे खुली रहने वाली कोई साइबर लाइब्रेरी तक नहीं है। अन्य गैर-शैक्षणिक सुविधाओं की बात करें तो परिसर में आवागमन के लिए बसें तक पर्याप्त नहीं हैं, जबकि हर आधा घंटे पर बस की सुविधा होने की ज़रूरत शिद्दत से महसूस की जा रही है। कैंटीन की सुविधा तक स्तरीय नहीं है।


तकनीक के इस युग में कंप्यूटर का इस्तेमाल शिक्षा में बहुत बढ़ गया है, लेकिन इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रशासन इस बारे में सोचने को तैयार नहीं। गैर-शैक्षणिक गतिविधियों के नाम पर छात्र-संघ चुनाव मात्र हैं। किसी तरह के सेमिनार, कॉन्फ्रेंस, वाद-विवाद और सांस्कृतिक तथा साहित्यिक गतिविधियाँ अब सुनी-सुनाई बातें हो गई हैं। केंद्रीय विश्वविद्यालय होने के नाते अपेक्षा की जाती है कि यहां हर साल टॉपर्स मीट का आयोजन हो, लेकिन इस बारे में छात्रनेता तक चुप हैं।


छात्र-राजनीति के बारे में ज़रूर ये कहा जा सकता है कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय में लोकतंत्र का स्वरूप अब भी बचा हुआ है। प्रशासन की ओर से इसे चोट पहुंचाने की कोशिश तो काफी की जा रही है, और छात्र-राजनीति में गुंडा तत्वों की बढ़ती सक्रियता के कारण प्रशासन को बल भी मिलता दिखता है, लेकिन अभी तक छात्र संघों ने लोकतंत्र को कुचलने वाले प्रयासों को सफल नहीं होने दिया है।  छात्र संगठनों के बीच आपस में लड़ाई-झगड़े की खबरें भी बहुत आने लगी हैं जिससे छात्र-एकता भी भंग होती दिखती है।


हॉस्टल वॉश आउट की जो कार्रवाई हो रही है, उससे पैदा विवाद भी विश्वविद्यालय की छवि खराब कर रहे हैं। हालाँकि ये कार्रवाई हाईकोर्ट के आदेश पर हो रही है, इसलिए छात्र आंदोलन और हिंसा से इसमें कुछ फर्क पड़ता नहीं दिखता। हाँ, ये ज़रूर होना चाहिए कि वैध छात्रों को किसी तरह की दिक्कत न हो, और अवैध छात्रों को हर हाल में बाहर भी किया जाए। दरअसल अवैध छात्रों को बाहर करने की माँग तो जेनुइन छात्र-छात्राओं को ही उठानी चाहिए थी।


मौजूदा हालात में भी बदलाव और सुधार की उम्मीद आज भी छात्रसंघ से ही है। ज़रूरत इस बात की है कि छात्रों के वास्तविक मुद्दे सामने रखे जाएँ, और छात्रहित में राजनीतिक निष्ठा को एक सीमा से ज्यादा महत्व न दिया जाए।

(लेखिका नेहा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से पोषण विज्ञान में स्नातकोत्तर हैं, और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रही हैं।)

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Ya U r Right & In sb chhejo Se AU me na padhne wale Students pr bhi bhut Asar Padta hai Gav se wo Compatition ki Tayyari krne jate hai 1-2 year ke liye Aour unka pura Time Yhi sb me nikal jata hai Kbhi Raili to kbhi Road jam Kbhi Coaching me todfad hote rhta hai Unka 1-2 sal kaise nikal jata hai Pta hi nhi chalta hai .... Mai chahta hu Ye sb Rokne ke liye Koi #Muhim Chalan Chahiye Plzzz ....

MOHD KASIM

इतनी कडुवी सच्चाई न लिखा करोneha

varun

Isake liye puri tarah university ki kary pranali jimmedar h

Arun kumar yadav

Ye sb vha rh rhe illegal ChhatraNetao ki vjh se ho rha h ..........washout ki baat bht hi achhi h jo honi chahiye

shani

भारत के तमाम विश्वविद्यालयों मे ये कड़वी विसंगतियां तेजी से सामने आ रही हैं, इलाहाबाद विश्वविद्यालय अपने संस्थापना उद्देश्यों से भटक रहा है, इसमें छात्र, कर्मचारी तथा शिक्षक सब योगदान कर रहे।

Pravin

भारत के तमाम विश्वविद्यालयों मे ये कड़वी विसंगतियां तेजी से सामने आ रही हैं, इलाहाबाद विश्वविद्यालय अपने संस्थापना उद्देश्यों से भटक रहा है, इसमें छात्र, कर्मचारी तथा शिक्षक सब योगदान कर रहे।

Pravin

जी मोहम्मद कासिम जी पूर्ण सत्य शिक्षा के स्तर को पूर्ण सफल बनाने और पूना स्थिति सही करने का प्रयास की मुहीम चलाई जाएगी ।

Neha

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